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टैग्स: पुस्तकसमीक्षा


ब्लॉग्स (14)
ध्यान की चर्चा इन दिनों बहुत है। कामयाबी के लिए पागल इस दुनिया में ध्यान को भी कामयाबी का एक मंत्र, एक टोटका मान लिया गया है। कुछ नकली बाबा तो दावा करते हैं कि ध्यान से आप में दुनिया को जीतने की ताकत आ जाएगी। पर क्या वाकई ध्यान कामयाबी का कोई टोटका है? ... आगे पढ़ें...

सोनू निगम का हृदय परिवर्तनजयप्रकाश चौकसे Wednesday, September 02, 2009 सारे भौतिक विकास में अध्यात्म जुड़ा है, क्योंकि पूरी निष्ठा से अपना काम करने वाला प्रत्येक शख्स आध्यात्मिक आनंद प्राप्त कर रहा है। भगवा कपड़ा धारण करके हिमालय जाना आवश्यक नहीं है। ... आगे पढ़ें...

कठपुतलियों का खेल कितना प्यारा लगता है | नाचती, गाती, लड़ती, झगड़ती, बात करती हुई कठपुतलियाँ उनकी डोर को थामकर रखने वालों के हाथों का तिलस्मी खेल होता है | तिलस्मी इसलिए कहा क्योंकि देखने वालों को वो हाथ दिखाई नहीं देते, जिनके द्वारा कठपुतलियों में जान आ ... आगे पढ़ें...

कितना हलका-सा, हलका-सा तन हो गयाजैसे शीशे का सारा बदन हो गयागुलमोहर के-से फूलों में बिखरी हुई कहकशां के-से रास्ते पे निखरी हुई मेरी पलकों पे मोती की झालर सजीमेरे बालों ने अफ़शां (सिंदूर्) की चादर बुनी मेरे आंचल ने आँखों पे घूंघट कियामेरी पायल ने सबसे पलट ... आगे पढ़ें...

गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी दे मौला दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है सोच-समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला फिर रौशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें झूठों की दुनिया में सच को ताबानी (जगमगहट) दे मौला फिर ... आगे पढ़ें...

मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग रोज़ मैं चाँद बनके आता हूँ दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ खनखनाता हूँ माँ के गहनों में हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में मैं ही मज़दूर के पसीने में !!!! मैं ही बरसात के महीने में मेरी तस्वीर आँख का आँसू ... आगे पढ़ें...

इस एक आँसू में चाहे साम्राज्य बहा दो वरदानों की वर्षा से यह सूनापन बिखरा दो इच्छाओं के कम्पन से सोता एकांत जगा दो आशा की मुस्कुराहट पर मेरा नैराश्य लुटा दो चाहे जर्जर तारों में अपना मानस उलझा दो इन पलकों के प्यालों में सुख का आसव छलका दो मेरे बिखरे ... आगे पढ़ें...

नज़्म उलझी हुई है सीने में मिसरे अटके हुए हैं होठों पर लफ्ज़ कागज़ पर बैठते ही नहीं उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह कब से बैठा हुआ हूँ मैं, ‘जानम सादा कागज़ पे लिखके नाम तेराबस तेरा नाम ही मुकम्मल है इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी - ग़ुलज़ार साहब आगे पढ़ें...

मुझे नहीं मालूम मेरी प्रतिक्रियाएँसही हैं या ग़लत हैं या और कुछसच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्यसुबह से शाम तकमन में हीआड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँअपनी ही काटपीटग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में किइतना उलझ जाता हूँ किज़हर नहीं लिखने की स्याही मैं पीता ... आगे पढ़ें...

साँझ ढले गगन तलेहम कितने एकाकीसाँझ ढले गगन तलेहम कितने एकाकीछोड़ चले नैनो कोकिरणों के पाखीपथ की जाली से झाँक रही थीं कलियाँ गंध भरी गुनगुन में मगन हुई थीं कलियाँइतने में तिमिर दस सपने ले नयनो मेंकलियों के आँसुओं का कोई नहीं साथीछोड चले नयनो कोकिरणों के ... आगे पढ़ें...

एक बेचारी नज़्म के पीछे सैंकड़ों रोज़मर्रा के मसले तेज़ नेज़े उठा के भागते हैं मुंतशिर ज़हन के बियाबाँ में दास्तानों की ‘बीबा शहज़ादी लीरा-लीरा-सा पैरहन पहने हाँफती-हाँफती बदहवास बेचारी मुझसे आकर पनाह माँगती है एक बेचारी नज़्म की इस्मत सैंकड़ों रोज़गार के मसले आगे पढ़ें...

तू सुगन्ध है सुगन्ध किसी की मल्कियत नहीं हुआ करती तू मेरी मल्कियत नहीं। सुगन्ध अहसास के लिए है बाज़ुओं में उसकी कल्पना धोखा है अपने आप से धोखे में जीना खुद को क़त्ल करना है मैंने ख़ुद को क़त्ल किया है। मैंने हर पल कमज़ोरियों का ज़हर पिया है। हर सोच में तू मेरी ... आगे पढ़ें...

मेरी कुण्ठा रेशम के कीड़ों सी ताने-बाने बुनती, तड़प तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुण्ठा क्वांरी कुन्ती। बाहर आने दूँ तो लोक-लाज मर्यादा भीतर रहने दूँ तो घुटन, सहन से ज्यादा, मेरा यह ... आगे पढ़ें...

ये समीक्षा नहीं है, सचमुच समीक्षा नहीं है। समीक्षा तो पुस्तक की होती है, जीवित गाथाओं की नहीं। अच्छा बुरा पहलू तो लिखे हुए हर्फ़ों का देखा जाता है, उन हर्फ़ों का नहीं, जो रूह बनकर गाथाओं के शरीर में बसते हों। कुछ हर्फ़ आँखों से गुज़र कर चेतना बन कर हमारे ... आगे पढ़ें...