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टैग्स: जन्म


ब्लॉग्स (6)
रहस्यमयी रेखा (रेखा के जन्मदिन पर अमृता प्रीतम की कविता)मैंने तो कहा था-तू साथ चलती रहेऔर मैं कभी न थकूँ!मैंने यह कब कहा था-कि अपनी राह के आगे कोई घर न होपैरों तले भटकन का लंबा सफर बीच जाएएक चुंबन के छोड़ बनाने की खातिरबेगानी ओट से पनाह मांगे!मैंने तो कहा ... आगे पढ़ें...

मैं तुम्हें फिर मिलूँगीकहाँ? किस तरह? नहीं जानतीशायद तुम्हारे तख़्यिल की चिनगारी बनकरतुम्हारे कैनवस पर रहस्यमय रेखा बनकरख़ामोश तुम्हें देखती रहूँगीया शायद सूरज की किरण बनकर तुम्हारे रंगों में घुलूँगीया रंगों की बांहों में बैठकरतुम्हारे कैनवस को लिपटूँगीपता ... आगे पढ़ें...

इंतज़ार की रात बहुत अंधेरी थीलेकिन देह का दिया प्रकाशितकल हवा भी चली तो धीमे-धीमे रूह से एक आह निकलीऔर जिस्म तलबग़ार हुआकल ख़्वाहिशें निकली तो धीमे-धीमे तन्हाई का कोना दाँतों में दबाए रात कसमसाती रही ख़्वाब नींद से बचके निकले धीमे-धीमेशिकायतों का दरिया आँखों ... आगे पढ़ें...

संशयो वाली रात में मस्तिष्क से प्रश्नों की झड़ी निकल रही थी, जिनसे वस्तु तुल्य हृदय का कोई लेना देना नहीं...वस्तु तुल्य इसलिए क्योंकि जब प्रश्न लौकिक हो तो उनका जवाब अलौकिक भाषा में देना निरर्थक प्रयास है... और वो निरर्थक प्रयास उस हृदय द्वारा ही तो हो रहे ... आगे पढ़ें...

एक अदद आदमीएक अदद औरत बस मुझे प्रकृति रहने दो इससे कम मुझे जिस्म नहीं होनाइससे ज्यादा मुझे रूह नहीं बनना मुझे बनना है फिर वही हव्वा तुममें देखना है फिर वही आदम और चखना है फिर वही वर्जित फल अपने गुनाहों पर शर्मसार होने मंजूर है मुझे यदि इस गुनाह के बादहम ... आगे पढ़ें...

कल शाम तेरी बातों से जो दो लफ्ज़ चुराकर लाई थी उसे आँखों पर रखकर मूँद कर देखा कभी लबों पर रखकर दाँतो तले दबा लियालेकिन वो कभी आँखों से आँसू बनकर बह गए तो कभी हल्की सी मुस्कुराहट से पिघल गए रात होते होते उन लफ्ज़ों का विस्तार होने लगा छुपाने की कोई जगह न ... आगे पढ़ें...