
बहुत दिनों से हताशा के बादल मंडरा रहे थे, कभी पर्सनल कभी प्रोफेशनल रूप में, कुछ अहम था, कुछ ज़िद की इस बार इन्हें बरसने नहीं दूँगी आँखों से। मन की कठोरता कहीं न कहीं व्यवहार में आने लगी थी, लेकिन अहम पसीज नहीं रहा था। ऐसे में कल शाम को न जाने क्या हुआ कि ...
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