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चैनल: पर्सनल डायरी


ब्लॉग्स (5)
आज फिर सुबह-सुबह पापा का सपना साथ लिए जागी हूँ| और साथ ही एक शिक़ायत-सी ज़ुबान पर आ गई, जैसे पापा से कह रही हूँ कि मेरे जन्म लेने के बाद से आज तक मुझे ऐसा कोई दिन याद नहीं आता जब मुझे आपका किसी भी काम के लिए मार्ग दर्शन मिला हो| ज़िंदगी की छोटी से छोटी और ... आगे पढ़ें...

अनुभूति को लफ्ज़ों का पैरहन मिल जाता है तो सोलहवे सावन के यौवन की तरह मदमाती है, नहीं मिल पाता तो बावरी हो जाती है....जैसे कोई पागल फटे कपड़ों में दर ब दर भटकती है.............मैंने दोनों अवस्थाओं को भोगा है..........लफ्ज़ों के पैरहन में टँका घमण्ड, चुनरिया ... आगे पढ़ें...

सूफ़ी गीत और माँ का कोई रिश्ता होता है क्या मुझे नहीं पता लेकिन आज पता नहीं क्यों आबिदा परवीन को सुनते हुए मैंने सूफ़िज़्म को माँ की ममता से जोड़ लिया....शायद ये मेरी ज़रुरत थी। पीड़ा के दिनों में माँ का आँचल याद आता है और जब वो आँचल कहीं नहीं मिलता तो दिल की ... आगे पढ़ें...

एक लम्बे कठिन सफर के बाद समय आज फिर वहीं खड़ा है हाथ बाँधे, गंभीर मुद्रा में, बीच-बीच में मन के खाली कमरे में चहल कदमी करता हुआ.....और ज़िंदगी घुटनों में सिर झुकाए बैठी है....सिर्फ चंद पलों के लिए.....जब तक माथे पर हताशा की सलवटें हैं, क्योंकि कहीं सुना है ... आगे पढ़ें...

बहुत दिनों से हताशा के बादल मंडरा रहे थे, कभी पर्सनल कभी प्रोफेशनल रूप में, कुछ अहम था, कुछ ज़िद की इस बार इन्हें बरसने नहीं दूँगी आँखों से। मन की कठोरता कहीं न कहीं व्यवहार में आने लगी थी, लेकिन अहम पसीज नहीं रहा था। ऐसे में कल शाम को न जाने क्या हुआ कि ... आगे पढ़ें...