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चैनल: पंखुड़ियाँ


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ब्लॉग्स (17)
रोज़ रात दर्द की दहलीज़ को पार कर ख़ुशियों के आंगन में पैर रखती हूँफिर पैरों में सितारों की पायल पहनआसमान से चाँद तोड़ चखती हूँये चाँद भी बड़ा अजीब है रोज़ अलग स्वाद देता हैमैं कभी ख़ुद खा लेती हूँ कभी बच्चों के लिए रख लेती हूँमैं दौड़कर वहां पहुँचती हूँ ... आगे पढ़ें...

त्रिकोण के तीन कोण परस्पर आधारित, एक-दूसरे के सामने एक-दूसरे के होने का आभास दिलाते हैंकोई एक रेखा भी कम हुई तो एक दूसरे से दूर खो जाएँगे अनंत में कहीं खोए हुए रिश्ते की तरह आगे पढ़ें...

मैं ईश्वरमैं मनुष्य के रूप में ईश्वरमैं उस पत्थर की मूरत में ईश्वर मैं निराकार में ईश्वरमैं तुम्हारी सूरत में ईश्वर बस तुम मुझे पुकारो अपनी आँखें बंद किएइतनी श्रद्धा से, इतनी शिद्दत से कि तुम आँखें खोलो और मुँह से तुम्हारे ही, ये निकले बोलो वत्स क्यों ... आगे पढ़ें...

मैंने कोशिश ज़रूर की मैं भीड़-सा हो जाऊँ जो अकेले नहीं कह सका उसे एक नारा बनाऊँ चार लोग कहते हैं तो सच लगता है मैं अकेला कैसे आवाज़ लगाऊँ लेकिन मैं भीड़ ना हो सका बीच में कहीं खड़ा हो गया कारवां उपर से गुजर गया मैंने बहुत कोशिश कीमैं सतही हो जाऊँ और तैरता रहूँ ... आगे पढ़ें...

तेरे माथे पे यह आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिनतू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था- मजाज़ लखनवी आगे पढ़ें...

विचारों की कोई परिभाषा नहीं होती वो तो मन के बादलों पर बैठकर कहीं भी बरस जाते हैं, ज्ञान की कश्ती में बैठकर भीडूब जाते हैं,हवा में बहते-बहते थम जाते हैं, क्रोध को बुझाते हुए खुद जल जाते हैं, प्रेम को फैलाते हुए देह में सिमट जाते हैं, करुणा को रोकते हुए ... आगे पढ़ें...

तुम मेरे जीवन के एकांत को चाहे न भर सको लेकिन तुम उस वाक्य में रिक्त स्थान की पूर्ति करते हो जिससे जीवन की परिभाषा पूरी होती है आगे पढ़ें...

मैं अब भी बैठा हूँ खामोश तुम्हारी साँसों को लबों पर सजाएलोग कहने लगे हैं कि मैं आँखों से बहुत बोलने लगा हूँ आ जाओ और ले जाओ उसे वापस मेरी बातों को छूए बिनाइससे पहले कि लोगों के सवालों का लबों से जवाब न दे सकूँ....मैं चाहती थी कि तुम देख सको मेरी आँखों से ... आगे पढ़ें...

वो एक पूरा संवाद था जब तुमने कहा था ऐसा कुछ विशेष नहीं हमारे बीच जो रहे सदियों तक और हम उस सदी को हर पल जीते रहें। वो पूरा संवाद था जिसे मैं उठाकर लाई थी अपनी पलकों के किनारे पर रखकर बावजूद इसके कि वह ऊपर से छलक रहा थावो पूरा संवाद था जिसे मैं नाराज़गी ... आगे पढ़ें...

मेरे सपने मुझे सोने नहीं देते कभी रात की चादर पर पड़ी सलवटों से चुभते हैं तो कभी दिन के आसमां से जलती धूप से बरसते हैंमैं अकसर रातों में उठकरउन सलवटों को हटाता हूँ और भरी दोपहर काला चश्मा पहनकर निकलता हूँ। यदि रात एक करवट में निकाल भी लूँ तो पीठ का दर्द ... आगे पढ़ें...

वो खामोशी की अंधेरी गलियाँ जहाँ दोचार शब्दों के दीये राह दिखाने के लिए रख दिए गए हैं वहीं से गुज़र रहा हूँ .... कई ख़ुफ़िया दरवाज़े विचारों की मानिंदराह में मिल जाते हैं कुछ रोशनी की झालर सजाएआकर्षित करते हैं कुछ रहस्यमयी किले के बड़े से दरवाज़ों की तरह चुप्प ... आगे पढ़ें...

मैं निश्चिंत हूँ चिंतित नहींजो थम गया-सा लगता है वो थमा नहीं है, क्योंकि धरा को किसी ने धुरी पर घूमते नहीं देखा है, उम्र को बढ़ते और झुर्रियों को चेहरे पर चढ़ते नहीं देखा है। आज जो थमे हुए से लगते हैं तो वो एक परिक्रमा को पूरा करने का ग़ुरूर है। अपनी ही धुरी ... आगे पढ़ें...

तुझसे मिलने से पहलेज़िंदगी एक तलाश थी, जैसे एक जिस्म की चाह होकिसी भटकती रूह को। तुझसे मिलने से पहले ज़िंदगी एक तलाश थी जैसे एक रूह की चाह हो किसी खाली जिस्म को। तुझसे मिलने के बाद रूह रिहा हो गई है जिस्म के दायरे से तुझसे मिलने के बाद ज़िंदगी बच गई है ... आगे पढ़ें...

मौन जब मुखर हो जाता हैतो झरने लगता है आँखों की किलकारियों से साँसों की जुम्बिश से....... या उफन जाता है दूध में आए उबाल की तरहरसोई में ढेर सारे कामों के बीचएक और काम बढ़ाता हुआ........ या बजने लगता है गर्म तवे पर झन्नाटेदार पानी की बूँदों की तरह बावजूद ... आगे पढ़ें...

तुम तुम ही रहोमैं मैं ही रहूँ.............. जीवन का नितांत सचउसके परे कुछ असहमतियाँ, कुछ पसंद और पसंदीदा शख्स के इर्द गिर्द घूमते पूर्वाग्रह कुछ लड़ाइयाँ, और लड़ाइयों के बाद की उत्कंठाफिर भी तुम तुम ही रहो मैं मैं ही रहूँ................... आगे पढ़ें...

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