 ज़िंदगी के घर में जब भी झाँककर देखते हैं, तो आँगन में सुख मिट्टी में खेलता नज़र आता है। ममता उसे डाँट डपटकर घर के अंदर ले जाने की कोशिश करती है। घर के अंदर शिकायतें मुखिया की कुर्सी पर बैठे हुए सुख के छोटे-छोटे पलों के अंदर आने का इंतज़ार कर रही होती है। और ... आगे पढ़ें...
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 नफ़रत बहुत दिनों तक नहीं रहती, लेकिन जितनी देर रहती है, फफोलों की तरह उभर आती है कविताओं से कहानियों से और रिसती रहती है ताज़े घावों की तरह......नफ़रत समय के साथ सूख जाती है, लेकिन कुछ निशान छोड़ जाती है, छिले हुए घुटनों पर या बचपन में माथे पर लगी किसी चोट की ... आगे पढ़ें...
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तुम तुम ही रहोमैं मैं ही रहूँ.............. जीवन का नितांत सचउसके परे कुछ असहमतियाँ, कुछ पसंद और पसंदीदा शख्स के इर्द गिर्द घूमते पूर्वाग्रह कुछ लड़ाइयाँ, और लड़ाइयों के बाद की उत्कंठाफिर भी तुम तुम ही रहो मैं मैं ही रहूँ................... आगे पढ़ें...
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 ...जैसे दुनिया-सी हो चली थी, अहम और नफरत की आग में जलती हुई.....तभी एक हाथ मेरी आँखों के अंधेरे को चीरता हुआ करीब आया और कहने लगा, आ तुझे तेरी रोशनी का शहर दिखाऊँ जहाँ पिछले जनम में तू घर-घर जाकर उम्मीद के दीये जलाकर आई थी। वहाँ हर घर में शब्दों ने जन्म ... आगे पढ़ें...
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 कोई है जो मेरे शब्दों में अपना वजूद ढूँढता है, मेरे कहे हुए शब्दों को सहेजकर रखता है, मेरी खामोशी के मौसम में झड़ गए शब्दों को आँखों का पानी देकर हमेशा हरा रखता है..... कोई है जो मुझेमेरे जैसा बने रहने देता है और खुद मुझ में ढलकर मेरे वजूद को बड़ा कर देता ... आगे पढ़ें...
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 जब सही अर्थों में लिखना शुरू किया था तब लगा था मुझे मेरे हर्फ़ों से इश्क़ हो गया है, वो शुरुआती दिनों का आकर्षण, फिर ज़माने की नज़र से बचकर नज़रें मिलाना, वो रोज़-रोज़ की मुलाकातें, ..............दिन-रा... आगे पढ़ें...
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एक लम्बे कठिन सफर के बाद समय आज फिर वहीं खड़ा है हाथ बाँधे, गंभीर मुद्रा में, बीच-बीच में मन के खाली कमरे में चहल कदमी करता हुआ.....और ज़िंदगी घुटनों में सिर झुकाए बैठी है....सिर्फ चंद पलों के लिए.....जब तक माथे पर हताशा की सलवटें हैं, क्योंकि कहीं सुना है ... आगे पढ़ें...
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 ये समीक्षा नहीं है, सचमुच समीक्षा नहीं है। समीक्षा तो पुस्तक की होती है, जीवित गाथाओं की नहीं। अच्छा बुरा पहलू तो लिखे हुए हर्फ़ों का देखा जाता है, उन हर्फ़ों का नहीं, जो रूह बनकर गाथाओं के शरीर में बसते हों। कुछ हर्फ़ आँखों से गुज़र कर चेतना बन कर हमारे ... आगे पढ़ें...
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 बहुत दिनों से हताशा के बादल मंडरा रहे थे, कभी पर्सनल कभी प्रोफेशनल रूप में, कुछ अहम था, कुछ ज़िद की इस बार इन्हें बरसने नहीं दूँगी आँखों से। मन की कठोरता कहीं न कहीं व्यवहार में आने लगी थी, लेकिन अहम पसीज नहीं रहा था। ऐसे में कल शाम को न जाने क्या हुआ कि ... आगे पढ़ें...
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 मैं खाली हूँ जैसे सूरज अपनी किरणों को धरती को देकर खाली हो गया मैं खाली हूँ जैसे चाँद अपनी चाँदनी आसमां को देकर खाली हो गया मैं खाली हूँ जैसे नदी अपना पानी समन्दर को देकर खाली हो गईमैं खाली हूँ जैसे माँ की कोख बच्चे को जन्म देने के बाद खाली हो जाती है फिर ... आगे पढ़ें...
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 अल्हड़ उम्र की नादानियाँ समय की परतों में हमेशा के लिए दफ़न हो गई....और किसी की बातों में, किसी की आँखों में, किसी की धड़कनों में उगने लगी। किसी के लिए सिर्फ एक बैचेनी हूँ, किसी के लिए भटकन, कभी कोई आपा कहता है कोई माँ और अंततः इश्क बनकर खुद पर घमंड आ गया ... आगे पढ़ें...
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