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ब्लॉग्स (56)
वो खामोशी की अंधेरी गलियाँ जहाँ दोचार शब्दों के दीये राह दिखाने के लिए रख दिए गए हैं वहीं से गुज़र रहा हूँ .... कई ख़ुफ़िया दरवाज़े विचारों की मानिंदराह में मिल जाते हैं कुछ रोशनी की झालर सजाएआकर्षित करते हैं कुछ रहस्यमयी किले के बड़े से दरवाज़ों की तरह चुप्प ... आगे पढ़ें...

मुझे नहीं मालूम मेरी प्रतिक्रियाएँसही हैं या ग़लत हैं या और कुछसच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्यसुबह से शाम तकमन में हीआड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँअपनी ही काटपीटग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में किइतना उलझ जाता हूँ किज़हर नहीं लिखने की स्याही मैं पीता ... आगे पढ़ें...

मैं निश्चिंत हूँ चिंतित नहींजो थम गया-सा लगता है वो थमा नहीं है, क्योंकि धरा को किसी ने धुरी पर घूमते नहीं देखा है, उम्र को बढ़ते और झुर्रियों को चेहरे पर चढ़ते नहीं देखा है। आज जो थमे हुए से लगते हैं तो वो एक परिक्रमा को पूरा करने का ग़ुरूर है। अपनी ही धुरी ... आगे पढ़ें...

साँझ ढले गगन तलेहम कितने एकाकीसाँझ ढले गगन तलेहम कितने एकाकीछोड़ चले नैनो कोकिरणों के पाखीपथ की जाली से झाँक रही थीं कलियाँ गंध भरी गुनगुन में मगन हुई थीं कलियाँइतने में तिमिर दस सपने ले नयनो मेंकलियों के आँसुओं का कोई नहीं साथीछोड चले नयनो कोकिरणों के ... आगे पढ़ें...

मेरी बीस या पच्चीस रचनाओं को पढ़ने के बाद कोई एक रचना उसे पसंद आती है। मेरा सबसे बड़ा और एकमात्र आलोचक है वो.... मैं जिसे पढ़ती हूँ वो उसे कभी पसंद नहीं आता, जो मैं लिखती हूँ उसे पढ़कर वो मुझे ऐसे डाँटता है जैसे कोई टीचर ठीक से होमवर्क न करके लाने के कारण ... आगे पढ़ें...

अनुभूति को लफ्ज़ों का पैरहन मिल जाता है तो सोलहवे सावन के यौवन की तरह मदमाती है, नहीं मिल पाता तो बावरी हो जाती है....जैसे कोई पागल फटे कपड़ों में दर ब दर भटकती है.............मैंने दोनों अवस्थाओं को भोगा है..........लफ्ज़ों के पैरहन में टँका घमण्ड, चुनरिया ... आगे पढ़ें...

सूफ़ी गीत और माँ का कोई रिश्ता होता है क्या मुझे नहीं पता लेकिन आज पता नहीं क्यों आबिदा परवीन को सुनते हुए मैंने सूफ़िज़्म को माँ की ममता से जोड़ लिया....शायद ये मेरी ज़रुरत थी। पीड़ा के दिनों में माँ का आँचल याद आता है और जब वो आँचल कहीं नहीं मिलता तो दिल की ... आगे पढ़ें...

तुझसे मिलने से पहलेज़िंदगी एक तलाश थी, जैसे एक जिस्म की चाह होकिसी भटकती रूह को। तुझसे मिलने से पहले ज़िंदगी एक तलाश थी जैसे एक रूह की चाह हो किसी खाली जिस्म को। तुझसे मिलने के बाद रूह रिहा हो गई है जिस्म के दायरे से तुझसे मिलने के बाद ज़िंदगी बच गई है ... आगे पढ़ें...

जीवन एक मंथन सा हो चला हैजहाँ से पहले विष ही निकलता हैअमृत निकलने का विश्वास भी हैप्रतीक्षा है तो उस प्रभु कीजो फिर मोहिनी के रूप मेंअंदर के राक्षस को विष पिला देऔर अंदर के देवता को अमरता का वरदान मिले...... चिंता है तो बस इस बात कीकि क़िस्मत के राहू केतु ... आगे पढ़ें...

एक बेचारी नज़्म के पीछे सैंकड़ों रोज़मर्रा के मसले तेज़ नेज़े उठा के भागते हैं मुंतशिर ज़हन के बियाबाँ में दास्तानों की ‘बीबा शहज़ादी लीरा-लीरा-सा पैरहन पहने हाँफती-हाँफती बदहवास बेचारी मुझसे आकर पनाह माँगती है एक बेचारी नज़्म की इस्मत सैंकड़ों रोज़गार के मसले आगे पढ़ें...

लोग अकसर मुझसे पूछ्ते हैं कि आपके पुराने ब्लॉग में ओशो के लिए एक अलग से चैनल हुआ करता था वैसा ही नए में क्यों नहीं है? आपका पहला ब्लॉग प्रेम, आध्यात्म और ओशो से लबालब हुआ करता था अब क्या हुआ? अब क्यों आपके ब्लॉग में अभिमान और कुण्ठा जैसी वस्तुएँ दिखने लगी ... आगे पढ़ें...

तू सुगन्ध है सुगन्ध किसी की मल्कियत नहीं हुआ करती तू मेरी मल्कियत नहीं। सुगन्ध अहसास के लिए है बाज़ुओं में उसकी कल्पना धोखा है अपने आप से धोखे में जीना खुद को क़त्ल करना है मैंने ख़ुद को क़त्ल किया है। मैंने हर पल कमज़ोरियों का ज़हर पिया है। हर सोच में तू मेरी ... आगे पढ़ें...

मेरी कुण्ठा रेशम के कीड़ों सी ताने-बाने बुनती, तड़प तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुण्ठा क्वांरी कुन्ती। बाहर आने दूँ तो लोक-लाज मर्यादा भीतर रहने दूँ तो घुटन, सहन से ज्यादा, मेरा यह ... आगे पढ़ें...

मौन जब मुखर हो जाता हैतो झरने लगता है आँखों की किलकारियों से साँसों की जुम्बिश से....... या उफन जाता है दूध में आए उबाल की तरहरसोई में ढेर सारे कामों के बीचएक और काम बढ़ाता हुआ........ या बजने लगता है गर्म तवे पर झन्नाटेदार पानी की बूँदों की तरह बावजूद ... आगे पढ़ें...

अतिथि- रजनीगन्धाNAME: रजनी भार्गव LOCATION: PLAINSBORO, NEW JERSEY, UNITED STATES http://rajnigandhaa.... आगे पढ़ें...

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