 इस एक आँसू में चाहे साम्राज्य बहा दो वरदानों की वर्षा से यह सूनापन बिखरा दो इच्छाओं के कम्पन से सोता एकांत जगा दो आशा की मुस्कुराहट पर मेरा नैराश्य लुटा दो चाहे जर्जर तारों में अपना मानस उलझा दो इन पलकों के प्यालों में सुख का आसव छलका दो मेरे बिखरे ... आगे पढ़ें...
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 किशोरावस्था अर्थात 12 से लेकर 18 साल तक की उम्र जिसके पहले एक बच्चे की देखभाल माता-पिता के हाथ में होती है। उसके बाद उम्र का वह दौर शुरू होता है, जिसमें वह कई बातों के लिए बड़ा हो चुका होता है और कुछ बातों के लिए अभी भी अपरिपक्व है। ऐसे में उसे ऐसी कई ... आगे पढ़ें...
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 तेरे माथे पे यह आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिनतू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था- मजाज़ लखनवी आगे पढ़ें...
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 ओम तत्सत श्री नारायण, पुरुषोत्तम गुरू तू सिद्ध, बुद्ध, तू स्कन्द विनायक, सविता पावक तू ब्रह्म मजद तू, यहव शक्ति तू, यीशू पिता प्रभु तू रूद्र विष्णु तू राम कृष्ण तू रहीम ताउ तू वासुदेव गो, विश्वरूप तू, चिदानन्द हरि तू अद्वितीय तू अकाल निर्भय, आत्मलिंगन शिव ... आगे पढ़ें...
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नज़्म उलझी हुई है सीने में मिसरे अटके हुए हैं होठों पर लफ्ज़ कागज़ पर बैठते ही नहीं उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह कब से बैठा हुआ हूँ मैं, ‘जानम सादा कागज़ पे लिखके नाम तेराबस तेरा नाम ही मुकम्मल है इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी - ग़ुलज़ार साहब आगे पढ़ें...
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 विचारों की कोई परिभाषा नहीं होती वो तो मन के बादलों पर बैठकर कहीं भी बरस जाते हैं, ज्ञान की कश्ती में बैठकर भीडूब जाते हैं,हवा में बहते-बहते थम जाते हैं, क्रोध को बुझाते हुए खुद जल जाते हैं, प्रेम को फैलाते हुए देह में सिमट जाते हैं, करुणा को रोकते हुए ... आगे पढ़ें...
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 संशयो वाली रात में मस्तिष्क से प्रश्नों की झड़ी निकल रही थी, जिनसे वस्तु तुल्य हृदय का कोई लेना देना नहीं...वस्तु तुल्य इसलिए क्योंकि जब प्रश्न लौकिक हो तो उनका जवाब अलौकिक भाषा में देना निरर्थक प्रयास है... और वो निरर्थक प्रयास उस हृदय द्वारा ही तो हो रहे ... आगे पढ़ें...
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एक अदद आदमीएक अदद औरत बस मुझे प्रकृति रहने दो इससे कम मुझे जिस्म नहीं होनाइससे ज्यादा मुझे रूह नहीं बनना मुझे बनना है फिर वही हव्वा तुममें देखना है फिर वही आदम और चखना है फिर वही वर्जित फल अपने गुनाहों पर शर्मसार होने मंजूर है मुझे यदि इस गुनाह के बादहम ... आगे पढ़ें...
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 कल शाम तेरी बातों से जो दो लफ्ज़ चुराकर लाई थी उसे आँखों पर रखकर मूँद कर देखा कभी लबों पर रखकर दाँतो तले दबा लियालेकिन वो कभी आँखों से आँसू बनकर बह गए तो कभी हल्की सी मुस्कुराहट से पिघल गए रात होते होते उन लफ्ज़ों का विस्तार होने लगा छुपाने की कोई जगह न ... आगे पढ़ें...
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 रिश्ते जब अनुभवों और अपने व्यक्तित्व से बड़े हो जाते हैं तो हमें उसे बनाए रखने के लिए अपने व्यक्तित्व के दायरे को बढ़ाना पड़ता है।रिश्ते बहुत खास हो तो अलग होने के कारण भी बहुत खास होने चाहिए।छोटी-छोटी बातों को बड़ा करके देखना है या बड़ी बातों को छोटे नज़रिये ... आगे पढ़ें...
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 तुम मेरे जीवन के एकांत को चाहे न भर सको लेकिन तुम उस वाक्य में रिक्त स्थान की पूर्ति करते हो जिससे जीवन की परिभाषा पूरी होती है आगे पढ़ें...
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 मैं अब भी बैठा हूँ खामोश तुम्हारी साँसों को लबों पर सजाएलोग कहने लगे हैं कि मैं आँखों से बहुत बोलने लगा हूँ आ जाओ और ले जाओ उसे वापस मेरी बातों को छूए बिनाइससे पहले कि लोगों के सवालों का लबों से जवाब न दे सकूँ....मैं चाहती थी कि तुम देख सको मेरी आँखों से ... आगे पढ़ें...
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 वो एक पूरा संवाद था जब तुमने कहा था ऐसा कुछ विशेष नहीं हमारे बीच जो रहे सदियों तक और हम उस सदी को हर पल जीते रहें। वो पूरा संवाद था जिसे मैं उठाकर लाई थी अपनी पलकों के किनारे पर रखकर बावजूद इसके कि वह ऊपर से छलक रहा थावो पूरा संवाद था जिसे मैं नाराज़गी ... आगे पढ़ें...
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 जब हमें ऊपरवाले से शिकायत करना होती है, उसे विनती करना होती है, उसे प्यार करना होता है या उससे लड़ाई करना होती है तो हम कुछ अलग तरह के गीतों का उपयोग करते हैं। कुछ लोग उसे सूफ़ी गीत कहते हैं कुछ उसे भजन कहते हैं।गीत के बोल अलग हो जाते हैं, कभी कभी संगीत भी ... आगे पढ़ें...
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 मेरे सपने मुझे सोने नहीं देते कभी रात की चादर पर पड़ी सलवटों से चुभते हैं तो कभी दिन के आसमां से जलती धूप से बरसते हैंमैं अकसर रातों में उठकरउन सलवटों को हटाता हूँ और भरी दोपहर काला चश्मा पहनकर निकलता हूँ। यदि रात एक करवट में निकाल भी लूँ तो पीठ का दर्द ... आगे पढ़ें...
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