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ध्यानस्थ अभय देओल

अनहद द्वारा नई दुनिया में 9 अक्टूबर को पर्दा बेपर्दा में प्रकाशित


ध्यान की चर्चा इन दिनों बहुत है। कामयाबी के लिए पागल इस दुनिया में ध्यान को भी कामयाबी का एक मंत्र, एक टोटका मान लिया गया है। कुछ नकली बाबा तो दावा करते हैं कि ध्यान से आप में दुनिया को जीतने की ताकत आ जाएगी। पर क्या वाकई ध्यान कामयाबी का कोई टोटका है? शायद नहीं।

भगवान बुद्ध से ज्यादा ध्यान किसने किया होगा? मगर बुद्ध के पिता की नजर से देखें तो बुद्ध एक असफल व्यक्ति ठहरते हैं। इसीलिए ज्ञान प्राप्ति के बाद जब बुद्ध घर आए तो उनके बेटे राहुल को उनके आगे खड़ा कर दिया गया और पुछवाया गया कि मुझे आप विरासत में क्या देने वाले हैं? बुद्ध ने भिक्षापात्र देकर कहा कि यही मेरी जायदाद है और तुम्हें मैं यही दूँगा।

जो लोग दुनिया जीतना चाहते हैं उनके पागलपन के लिए ध्यान मददगार नहीं हैं। जो लोग शानदार करियर बनाना चाहते हैं, ध्यान उनके लिए भी रोड़ा है। मगर हाँ, यदि आप कलाकार हैं, तो ध्यान आपके लिए सहायक है। ऐसा नहीं है कि ध्यान से किसी पेंटर का चित्र हुसैन से महँगा बिकेगा, मगर हाँ ध्यान से चित्रों में गहराई जरूर आ सकती है।



अभय देओल के अभिनय की गहराई का राज भी ध्यान में छिपा है। विदेशों में एक्टिंग का महँगा कोर्स करने के बाद उन्होंने ओशो मेडिटेशन रिसॉर्ट में कांशियस एक्टिंग नाम की एक थैरेपी भी की है। यह थैरेपी ओशो के नजरिए पर आधारित है। इसमें जीवन को ऐसे जीना होता है, जैसे वह अभिनय हो और अभिनय ऐसे किया जाता है मानो असल जीवन हो। इसके अलावा उन छोटे-छोटे पलों को भी बहुत ध्यान से जीना होता है जिनकी तरफ हम बहुत ध्यान नहीं देते।

इसके सिवा ओशो की ध्यान विधियों में एक "साक्षी भाव" से जीना है यानी जीवन में लिप्त होते हुए खुद को दूर खड़े होकर देखना। ओशो के चाहने वाले फिल्मी दुनिया में विनोद खन्ना रहे हैं। महेश भट्ट भी हैं। विनोद खन्ना कम्यून से वापस लौट आए, क्योंकि जिंदा गुरु के पास रहना दुनिया का सबसे कठिन काम है।

अभय देओल जब आठ साल के थे, तब अपनी स्कूल बस से उन्होंने ओशो के कुछ शिष्यों को देखा था। वे एक बंगले में ठहरे हुए थे। तभी उन्हें महसूस हुआ था कि इस व्यक्ति से मेरा दिल का रिश्ता है। अभय देओल परिपक्व व्यक्ति हैं। उन्हें पता है कि ध्यान से पिक्चर हिट नहीं होती। हाँ, ध्यान से नजर साफ हो जाती है। आपको ऐसा बहुत कुछ समझ में आने लगता है, जो पहले आप कभी नहीं समझ सकते थे। जो लोग ध्यान नहीं करते उनमें विजन या तो कुदरती तौर पर होता है या नहीं होता। मगर ध्यान से उन लोगों का भी विजन तैयार हो जाता है जिनमें यह पहले नहीं था। अभय देओल ने जिस तरह का काम अभी तक किया है, उससे पता चलता है कि उनका अभिनय भी कुंडलिनी जितना गहरा है और उनका विजन भी एकदम साफ है। क्या यह ध्यान का असर नहीं है?



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