रहस्यमयी रेखा (रेखा के जन्मदिन पर अमृता प्रीतम की कविता)
मैंने तो कहा था-
तू साथ चलती रहे
और मैं कभी न थकूँ!
मैंने यह कब कहा था-
कि अपनी राह के आगे कोई घर न हो
पैरों तले भटकन का लंबा सफर बीच जाए
एक चुंबन के छोड़ बनाने की खातिर
बेगानी ओट से पनाह मांगे!
मैंने तो कहा था-
आ मुहब्बत का हासिल हो जाएं
मैंने यह कब कहा था
कि इश्क को हादसे से पहले
हादसा मन लें
मनफ़ी होने के संशय में बरसों पहले उदास हो जाएं
जिन सपनों के बीज करवटें बदलते हैं
उन्हें ठहरी हवा में भी न बो सकें|![]()
मैंने तो यह कहा था-
हुस्न एक बुझ रहा दीया है
आ बुझने से पहले
मेंह की तरह बरस जाएं|
मैंने यह कब कहा था कि बूँद-सा गर्म रख पर गिरें
सुर-सुर कराते खत्म हो जाएं
साबित होने के दंभ में
खंडहर से खड़े दिखें!
लोड हो रहा है...
प्रतिक्रियाएँ