Welcome, Guest   [ Register | Sign In | Take a tour | Adult Filter: On ]

रहस्यमयी रेखा

रेखा के जन्मदिन पर अमृता प्रीतम की आखिरी कविता


मैं तुम्हें फिर मिलूँगी
कहाँ? किस तरह? नहीं जानती
शायद तुम्हारे तख़्यिल की चिनगारी बनकर
तुम्हारे कैनवस पर
रहस्यमय रेखा बनकर
ख़ामोश तुम्हें देखती रहूँगी


























या शायद सूरज की किरण बनकर
तुम्हारे रंगों में घुलूँगी
या रंगों की बांहों में बैठकर
तुम्हारे कैनवस को लिपटूँगी
पता नहीं कैसे-कहाँ?
पर तुम्हें ज़रूर मिलूँगी














या शायद एक चश्मा बनी होऊँगी
और जैसे झरनों का पानी उड़ता है
मैं पानी की बूँदें
तुम्हारे जिस्म पर मलूँगी
और ठंडक-सी बनकर
तुम्हारे सीने के साथ लिपटूँगी.....



मैं और कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह जन्म मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म जब मिटता है
तब सब-कुछ खत्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनाती कणों के होते हैं
मैं उन कणों को चुनूँगी
धागों को लपेटूँगी
और तुम्हें मैं फिर मिलूँगी......



















मैं उन कणों को चुनूँगी
धागों को लपेटूँगी
और तुम्हें मैं फिर मिलूँगी......

प्रतिक्रियाएँ

Re: रहस्यमयी रेखा
देवी, आपके उपशीर्षक से ये प्रतीत होता है मानों अमृता ने ये कविता रेखा के जन्मदिन पर लिखी है..... शायद आप ये कहना चाह रही हैं कि अमृता की ये आखिरी कविता, आप रेखा के जन्मदिन पर पोस्ट कर रही हैं.... नहीं????
Re: रहस्यमयी रेखा
जी बिलकुल नहीं, मेरा वही मतलब है जो मैंने लिखा है, क्योंकि कौन सी रचना किसके लिए लिखी गई है यह उस समय तय नहीं होता| ये तो अस्तित्व द्वारा जब सही समय पर सही जगह प्रकट होती है तब उसके सही मायने पता चलते है| कौन कहेगा कि यह रचना ऐमी ने रेखा के लिये नहीं लिखी? मैं तो बिलकुल नहीं कहूँगी| ऐसा लग रहा है जैसे ऐमी ने रेखा के लिए ही ये कविता लिखी है.... नहीं?????
अस्वीकरण