जयप्रकाश चौकसे Wednesday, September 02, 2009
सारे भौतिक विकास में अध्यात्म जुड़ा है, क्योंकि पूरी निष्ठा से अपना काम करने वाला प्रत्येक शख्स आध्यात्मिक आनंद प्राप्त कर रहा है। भगवा कपड़ा धारण करके हिमालय जाना आवश्यक नहीं है।
गायक सोनू निगम ने पार्श्व गायन का अवसर प्राप्त करने से पहले सैकड़ों ‘संस्करण’ गीत गाए हैं। इनमें मोहम्मद रफी के अनेक गीत शामिल हैं। फिल्मों के लिए पार्श्व गायन करते हुए उन्होंने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। सुना जाता है कि अब उन्हें अध्यात्म का रास्ता भा गया है और अनेक शक्तियां भी उन्हें प्राप्त हो गई हैं। उनकी जीवनशैली में आमूल-चूल परिवर्तन हो चुका है।
प्रत्येक मनुष्य पूरे जीवन एक अज्ञात संभावना बना रहता है। कब किस मोड़ पर उसमें छिपी सारी शक्तियां उजागर होंगी, यह कोई नहीं बता सकता। अधिकांश लोग बिना उजागर हुए ही मृत्यु की गोद में चले जाते हैं। खुद से रूबरू होने में बहुत समय लग जाता है। यह मामला आलस्य का नहीं वरन खुद से दूर भागने का है। इनमें सबसे अभागे वे हैं, जिन्हें स्वयं की क्षमताओं का आभास हमेशा से था, परंतु विराट संभावनाओं से घबरा जाते हैं। कारण, आत्मा में आणविक विस्फोट अजीब सी उजास पैदा करता है और अंधकार का अभ्यस्त व लतियड़ आदमी उससे बचना चाहता है। यह पलायन का भाव रहस्यमय है।
यह भी अजीब बात है कि जब एक भीड़ पलायन करती है, तब अनेक शहरों का विकास और जन्म होता है। इसके विपरीत जब एक व्यक्ति अपने भीतर के सच से पलायन करता है, तो उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है। सारे भौतिक विकास में अध्यात्म जुड़ा है, क्योंकि हर वह व्यक्ति जो पूरी निष्ठा से अपना काम कर रहा है, वह आध्यात्मिक आनंद प्राप्त कर रहा है। भगवा कपड़ा धारण करके हिमालय की ओर जाना आवश्यक नहीं है।
विजय आनंद की फिल्म ‘गाइड’ का नायक जेल से छूटकर पलायन कर रहा है। गांव वाले उसे सिद्ध पुरुष मानकर उसकी पूजा करने लगते हैं। वर्षा के अभाव से सभी त्रस्त हैं और हालात ऐसे बनते हैं कि वह वर्षा के लिए आमरण अनशन प्रारंभ कर देता है। निर्वाण के कुछ क्षण पहले उसे दिव्य रोशनी दिखती है और वर्षा भी होने लगती है। एक अनिच्छुक व्यक्ति शहादत हासिल करता है।
जीवन को अनिश्चित इसलिए कहते हैं कि मृत्यु का क्षण तय नहीं है। दरअसल अनिश्चय तो मनुष्य का है और भरपूर उजास का क्षण कब आएगा, पता नहीं। यह जीवन के अनिश्चित होने का असली कारण है। जीवन की क्षणभंगुरता भी एक तत्व है, जिससे प्राय: हम भयभीत रहते हैं। यह डर ही है जो मनुष्य को मौत से पहले कई बार मारता है। अमर होने की लालसा भी माया ही है।
टीएस इलियट की ‘मर्डर इन कैथेड्रिल’ में नायक को सत्य की राह से डिगाने के लिए चार टैम्पर्स जाते हैं। सारे भौतिक साम्राज्य को नकारने वाला इस प्रश्न से बचना चाहता है कि शहादत से प्रेम इतना प्रबल है कि मोह में बदल गया है। कितने मनुष्य मरने के बाद स्वर्ग पाने के लालच में न जाने क्या-क्या कर गुजरते हैं, जबकि वह उजास केवल एक व्यक्ति महसूस करता है और मृत्यु अपनी दहशत खो देती है। बहरहाल सोनू निगम अपना रोज का काम करते हुए ही अध्यात्म की ओर प्रवृत्त हुए हैं।
रस्ता देख रही है माता.......
भाग्य-चक्र - गुरुदत्त (पुस्तक समीक्षा)
लोड हो रहा है...
प्रतिक्रियाएँ