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रोज़ रात दर्द की दहलीज़ को पार कर
ख़ुशियों के आंगन में पैर रखती हूँ
फिर पैरों में सितारों की पायल पहन
आसमान से चाँद तोड़ चखती हूँ
ये चाँद भी बड़ा अजीब है
रोज़ अलग स्वाद देता है
मैं कभी ख़ुद खा लेती हूँ
कभी बच्चों के लिए रख लेती हूँ
मैं दौड़कर वहां पहुँचती हूँ
जहाँ हवाएं मेरा इंतज़ार करती है
फिर मैं उसका हाथ थामे
बादलों की ओर रुख करती हूँ
बादल बरसते हैं और
ज़मीं की प्यास बुझती है
मैं अपनी प्यास का
कुछ अलग बंदोबस्त करती हूँ
रात की प्याली में
नींद उड़ेल कर
ख़्वाबों के संग बैठकर
ज़िंदगी को चीयर्स करती हूँ
मैं दौड़कर दहलीज़ तक आती हूँ
और अपने दर्द को
फिर बाहों में भर लेती हूँ
पैरों से सितारों की पायल उतार
आसमान के तख्त पर रख देती हूँ
बादलों को हवा के हवाले कर
अपना आँचल माथे पर रख लेती हूँ
अंदर आती हूँ तो देखती हूँ
बच्चे रोज़ की तरह सो रहे हैं
और घर के लोग अपने काम में लगे हैं
मैं चुपके से बच्चों को उठाकर
उनके मुँह में चाँद का टुकड़ा रख देती हूँ
फिर चेहरे पर गंभीरता और परिपक्वता का नकाब ओढ़े
दिल के कोने में घूम रहे
बचपन के लट्टू को एक ओर लुढ़क देती हूँ.......
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