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24 सितंबर, 2009


ब्लॉग्स (1)
रोज़ रात दर्द की दहलीज़ को पार कर ख़ुशियों के आंगन में पैर रखती हूँफिर पैरों में सितारों की पायल पहनआसमान से चाँद तोड़ चखती हूँये चाँद भी बड़ा अजीब है रोज़ अलग स्वाद देता हैमैं कभी ख़ुद खा लेती हूँ कभी बच्चों के लिए रख लेती हूँमैं दौड़कर वहां पहुँचती हूँ ... आगे पढ़ें...