आज फिर सुबह-सुबह पापा का सपना साथ लिए जागी हूँ| और साथ ही एक शिक़ायत-सी ज़ुबान पर आ गई, जैसे पापा से कह रही हूँ कि मेरे जन्म लेने के बाद से आज तक मुझे ऐसा कोई दिन याद नहीं आता जब मुझे आपका किसी भी काम के लिए मार्ग दर्शन मिला हो| ज़िंदगी की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी मुश्किलों से मैं अकेले ही जूझती रही| उम्र का चाहे जो दौर गुजर रहा हो, ज़िंदगी जैसी आती गई मैंने वही किया जो दिल कहता रहा| मैंने उस मस्तिष्क का कभी उपयोग नहीं किया जो नियमों और संस्कारों के नाम पर कन्डीशंड हो जाता है| करती भी कैसे मैं अपने मस्तिष्क को उस तरह से कभी कंडीशंड कर ही नहीं पाई थी, इसलिए मुझे पता ही नहीं चलता था कि दिल और दिमाग अलग-अलग राह दिखा रहे हैं या नहीं|
पापा के मार्ग दर्शन के बिना ही जो दिल को सही लगता गया करती गई| हो सकता है उसमें से कई क़दम ऐसे भी रहें होंगे, जिसने मुझे जीवन में आगे बढाने के बजाय कुछ ऐसी पगडंडियों पर उतार दिया हो, जिसे हम अनुभव कह कर आने वाली पीढ़ी को कुछ सीख देने की कोशिश करते हैं|
कल ही पढ़ा था -
Good judgment comes from experience and often experience comes from bad judgment.
जीवन के कुछ ऐसे फैसले, जिनसे आपको अनुभव आपके पक्ष में न मिले हो, आगे कुछ नए फ़ैसलों को लेने में आपकी मदद ज़रूर करते हैं, लेकिन वो फैसले तब गलत थे और अब आप सही फ़ैसला ले रहे हैं, इसका फ़ैसला कौन करेगा? यदि वो फैसले ग़लत न होते तो आज आप उसके अनुभव को कैसे उपयोग में लाते? उस समय ग़लत फैसला लेना एक सही क़दम था तभी तो वो आज आपके नए क़दम को सही राह दिखा रहे हैं| यदि पुराने फैसले सही होते तो हमारा आज कितना नीरस होता| जीवन के कितने सारे रूपों से हम अछूते रह जाते| जीवन को किनारे पर बैठ कर बस उसकी लहरों से खेलते हुए गुज़ार देते| हम उस गहराई को समझ ही नहीं पाते जिसे कभी कोई शायर इश्क़ के नाम से पुकार कर आग का दरिया कहता है तो कोई दुनिया का जलवा कहता है|
और मैं कहती हूँ हर व्यक्ति अपने आप में पूरा एक जीवन है, पूरी एक दुनिया है| जब हम किसी एक व्यक्ति से मिल रहे होते हैं, तब हम सिर्फ़ उस व्यक्ति से नहीं एक जीवन से मिल रहे होते हैं| ऐसे कई जीवन से हम हमारी पूरी उम्र में मिलते हैं| जीने के लिए हमारे पास सिर्फ़ अपनी एक ज़िंदगी नहीं असंख्य ज़िंदगियाँ होती है.......
नहीं..... अब पापा से मुझे कोई शिक़ायत नहीं| हो सकता था पापा अपने मार्ग दर्शन में मुझे अपने जैसा बना देते, तो मैं अपने आप को कभी खोज ही नहीं पाती| आज यदि मैं खुद को जीवन के इस महासागर में पा सकी हूँ तो उसका श्रेय पापा को ही जाता है और जाता है उस माँ को जिसका कभी जिक्र मेरी ज़ुबान पर नहीं आया| आता भी कैसे उसका सिर्फ़ माँ होना ही मेरे लिए काफी है| मैं उस माँ और उसकी कोख के आगे नतमस्तक हूँ, जिसने मुझे जन्म दिया|
पिता से रिश्ता शिक़वे-शिक़ायतों और हक जमाने का हो सकता है, लेकिन माँ से रिश्ता तो सिर्फ़ समर्पण का होता है| वो तो उस परमात्मा की तरफ़ से भेजा गया वो दूत है, जिसने मुझे इस धरती पर भेजा है और जब उसने मुझे इस धरती पर भेजा है तो ज़रूर कोई बहुत बड़ा उद्देश्य रहा होगा| यूँ ही तो कुछ भी नहीं होता ना.......
-शैफाली ('नायिका')
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