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कितना हलका-सा, हलका-सा तन हो गया
जैसे शीशे का सारा बदन हो गया
गुलमोहर के-से फूलों में बिखरी हुई
कहकशां के-से रास्ते पे निखरी हुई
मेरी पलकों पे मोती की झालर सजी
मेरे बालों ने अफ़शां (सिंदूर्) की चादर बुनी
मेरे आंचल ने आँखों पे घूंघट किया
मेरी पायल ने सबसे पलट कर कहा
अब कोई भी न कांटा चुभेगा मुझे
ज़िंदगानी भी देगी न ताना मुझे
शाम समझाए भी तो न समझूँगी मैं
रात बहलाए भी तो न बहलूँगी मैं
सांस उलझाए भी तो न उलझूंगी मैं
मौत बहकाए भी तो न बहकूंगी मैं
मेरी रूह भी जला-ए-वतन हो गई
जिस्म सारा मेरा इक सेहन हो गया
कितना हलका-सा, हलका-सा तन हो गया
जैसे शीशे का सारा बदन हो गया
- मीना कुमारी
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