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शीशे का बदन

मीना कुमारी



























कितना हलका-सा, हलका-सा तन हो गया
जैसे शीशे का सारा बदन हो गया

गुलमोहर के-से फूलों में बिखरी हुई
कहकशां के-से रास्ते पे निखरी हुई
मेरी पलकों पे मोती की झालर सजी
मेरे बालों ने अफ़शां (सिंदूर्) की चादर बुनी
मेरे आंचल ने आँखों पे घूंघट किया
मेरी पायल ने सबसे पलट कर कहा

अब कोई भी न कांटा चुभेगा मुझे
ज़िंदगानी भी देगी न ताना मुझे

शाम समझाए भी तो न समझूँगी मैं
रात बहलाए भी तो न बहलूँगी मैं
सांस उलझाए भी तो न उलझूंगी मैं
मौत बहकाए भी तो न बहकूंगी मैं

मेरी रूह भी जला-ए-वतन हो गई
जिस्म सारा मेरा इक सेहन हो गया

कितना हलका-सा, हलका-सा तन हो गया
जैसे शीशे का सारा बदन हो गया

- मीना कुमारी

प्रतिक्रियाएँ

Re: शीशे का बदन
Waah ! Bahut hi sundar !
Re: शीशे का बदन
apne man ke bhavo ko es tarah sabdo me dhana; aisa to meena ji hi kar sakti hai
Re: शीशे का बदन
चाँद तन्हा है, आसमाँ तन्हा। ये भी कोई जीना है। जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा
अस्वीकरण