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16 जनवरी, 2009


ब्लॉग्स (1)
कितना हलका-सा, हलका-सा तन हो गयाजैसे शीशे का सारा बदन हो गयागुलमोहर के-से फूलों में बिखरी हुई कहकशां के-से रास्ते पे निखरी हुई मेरी पलकों पे मोती की झालर सजीमेरे बालों ने अफ़शां (सिंदूर्) की चादर बुनी मेरे आंचल ने आँखों पे घूंघट कियामेरी पायल ने सबसे पलट ... आगे पढ़ें...