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गरज-बरस

निदा फाज़ली




गरज-बरस प्यासी धरती पर
फिर पानी दे मौला

चिड़ियों को दाने, बच्चों को
गुड़धानी दे मौला
























दो और दो का जोड़ हमेशा
चार कहाँ होता है
सोच-समझवालों को थोड़ी
नादानी दे मौला


















फिर रौशन कर ज़हर का प्याला
चमका नई सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को
ताबानी (जगमगहट) दे मौला
















फिर मूरत से बाहर आकर
चारों ओर बिखर जा
फिर मन्दिर को कोई
“मीरा” दीवानी दे मौला


















तेरे होते कोई किसी की
जान का दुश्मन क्यों हो
जीनेवालों को मरने की
आसानी दे मौला


प्रतिक्रियाएँ

Re: गरज-बरस
बहुत सुंदर कविता, बहुत प्यारा प्रस्तुतीकरण, मन को भीतर तक छू लेने वाले मन के भावों से सजे इस ब्लोग को............. देव का दिल से सलाम...... आपको भी बहुत सारा धन्य्वाद........
Re: गरज-बरस
bht khubsurat hai apki tarah
Re: गरज-बरस
No, I don't agree with you..... it is more beautiful, speacily in Jagjit Singh's velvette voice
Re: गरज-बरस
ढ़ाई आखर प्रेम के होते, नफरत के हैं चार। हर दिन नफरत का छोटा हो, रात सुहानी दे मौला।। सादर श्यामल सुमन 09955373288 मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं। कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।। www.manoramsuman.blogspot.com
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