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मैं ख़ुदा बनके

निदा फाज़ली
















मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में
मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग

रोज़ मैं चाँद बनके आता हूँ
दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ

खनखनाता हूँ माँ के गहनों में
हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में

मैं ही मज़दूर के पसीने में !!!!
मैं ही बरसात के महीने में

मेरी तस्वीर आँख का आँसू
मेरी तहरीर जिस्म का जादू

मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में
मुझको पहचानते नहीं, जब लोग

मैं ज़मीनों को बिजिया (बिना रोशनी) करके
आसमानों में लौट जाता हूँ

मैं ख़ुदा बनके कहर ढाता हूँ


प्रतिक्रियाएँ

Re: मैं ख़ुदा बनके
सच है.... सच है...... सच है ...... मैं ख़ुदा बनके कहर ढाता हूँ
अस्वीकरण