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कुछ कुछ






















इंतज़ार की रात बहुत अंधेरी थी
लेकिन देह का दिया प्रकाशित

कल हवा भी चली तो धीमे-धीमे

















रूह से एक आह निकली
और जिस्म तलबग़ार हुआ

कल ख़्वाहिशें निकली तो धीमे-धीमे

















तन्हाई का कोना दाँतों में दबाए
रात कसमसाती रही

ख़्वाब नींद से बचके निकले धीमे-धीमे























शिकायतों का दरिया आँखों से बहा
किनारों से लुढ़क कर न जाने कहाँ गुम हुआ

दुपट्टे को रात भर सुखाती रही धीमे-धीमे

















एक पल को लगा अब न आएगी अगली साँस
और आखिरी साँस को सम्भाले रही

उम्मीद का दिया रात भर जलता रहा धीमे-धीमे

















कभी ठंडी आहों ने थामे रखा
कभी गर्म साँसो ने सम्भाला

यही "कुछ" होता रहा धीमे-धीमे




प्रतिक्रियाएँ

Re: कुछ कुछ
आपका सौतेला बच्चा, ये ब्लॉग, जिजीविषा भी धन्य हुआ होगा इस पोस्ट को पा कर.......... आप कब मुझे चमत्कृत करना छोडेंगी.......ज़िंदगी की सारी उथल पुथल, ऊहापोह के बीच रचनाधर्मिता का ऐसा निर्वाह....... शायद हर सृजनशील मनुष्य की नियति एक ही कलम से लिखी जाती है....पर आपको अपवाद बनना ही होगा... बनना ही है.....
Re: कुछ कुछ
http://naayika.mywebdunia.com/2008/11/25/1227602580000.html .... मुकम्मल दिल से कहाँ आह निकलती है, टीस तो वहीं से उठती है जहाँ दिल के हजारो टुकड़े किये हो हरजाई ने....
Re: कुछ कुछ
बेमिसाल कविता ...आपने तो इस के माध्यम से पूरी प्रेम कथा ही कह दी...चित्रों ने रही सही कसर भी पूरी कर दी...बेहतरीन पोस्ट...रेखा के इतने शानदार चित्र दिखाने पर शुक्रिया... नीरज
Re: कुछ कुछ
SOUTELA Blog sahi kaha hai ab to kabhi-kabhi yaha aati hain ap, apne vichaaro ko behtarin jama pehnaaya hain aapne.
Re: कुछ कुछ
आपकी ये कुछ कुछ तो जान ही ले लेगी मेरी.......
Re: कुछ कुछ
ध्यान चित्रों में ज्यादा जाता है --- बहुत सुंदर भवाभिव्यक्ति है --
अस्वीकरण