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इंतज़ार की रात बहुत अंधेरी थी
लेकिन देह का दिया प्रकाशित
कल हवा भी चली तो धीमे-धीमे ![]()
रूह से एक आह निकली
और जिस्म तलबग़ार हुआ
कल ख़्वाहिशें निकली तो धीमे-धीमे ![]()
तन्हाई का कोना दाँतों में दबाए
रात कसमसाती रही
ख़्वाब नींद से बचके निकले धीमे-धीमे![]()
शिकायतों का दरिया आँखों से बहा
किनारों से लुढ़क कर न जाने कहाँ गुम हुआ
दुपट्टे को रात भर सुखाती रही धीमे-धीमे ![]()
एक पल को लगा अब न आएगी अगली साँस
और आखिरी साँस को सम्भाले रही
उम्मीद का दिया रात भर जलता रहा धीमे-धीमे ![]()
कभी ठंडी आहों ने थामे रखा
कभी गर्म साँसो ने सम्भाला
यही "कुछ" होता रहा धीमे-धीमे ![]()
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