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नवंबर 2008


ब्लॉग्स (3)
गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी दे मौला दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है सोच-समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला फिर रौशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें झूठों की दुनिया में सच को ताबानी (जगमगहट) दे मौला फिर ... आगे पढ़ें...

मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग रोज़ मैं चाँद बनके आता हूँ दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ खनखनाता हूँ माँ के गहनों में हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में मैं ही मज़दूर के पसीने में !!!! मैं ही बरसात के महीने में मेरी तस्वीर आँख का आँसू ... आगे पढ़ें...

इंतज़ार की रात बहुत अंधेरी थीलेकिन देह का दिया प्रकाशितकल हवा भी चली तो धीमे-धीमे रूह से एक आह निकलीऔर जिस्म तलबग़ार हुआकल ख़्वाहिशें निकली तो धीमे-धीमे तन्हाई का कोना दाँतों में दबाए रात कसमसाती रही ख़्वाब नींद से बचके निकले धीमे-धीमेशिकायतों का दरिया आँखों ... आगे पढ़ें...