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अक्टूबर 2008


ब्लॉग्स (2)
मैं ईश्वरमैं मनुष्य के रूप में ईश्वरमैं उस पत्थर की मूरत में ईश्वर मैं निराकार में ईश्वरमैं तुम्हारी सूरत में ईश्वर बस तुम मुझे पुकारो अपनी आँखें बंद किएइतनी श्रद्धा से, इतनी शिद्दत से कि तुम आँखें खोलो और मुँह से तुम्हारे ही, ये निकले बोलो वत्स क्यों ... आगे पढ़ें...

मैंने कोशिश ज़रूर की मैं भीड़-सा हो जाऊँ जो अकेले नहीं कह सका उसे एक नारा बनाऊँ चार लोग कहते हैं तो सच लगता है मैं अकेला कैसे आवाज़ लगाऊँ लेकिन मैं भीड़ ना हो सका बीच में कहीं खड़ा हो गया कारवां उपर से गुजर गया मैंने बहुत कोशिश कीमैं सतही हो जाऊँ और तैरता रहूँ ... आगे पढ़ें...