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विचार



विचारों की कोई परिभाषा नहीं होती
वो तो मन के बादलों पर बैठकर
कहीं भी बरस जाते हैं,
ज्ञान की कश्ती में बैठकर भी
डूब जाते हैं,
हवा में बहते-बहते थम जाते हैं,
क्रोध को बुझाते हुए
खुद जल जाते हैं,
प्रेम को फैलाते हुए
देह में सिमट जाते हैं,
करुणा को रोकते हुए
अश्कों में बह जाते हैं
और तुझसे कुछ कहते-कहते
चुप हो जाते हैं।

प्रतिक्रियाएँ

Re: विचार
कुछ कहते कहते चुप हो जाते हैं..... ऐसा होने के कई कारण होते होंगे, मुझे जो ज्ञात है वो ये कि जब कही जा रही बात का खुद अपने पर ही एक नया अर्थ खुलने लगे, कुछ ऐसा जो हमने सोचा भी न हो और कई बार तो हमे ज्ञात भी न हो, तो आत्मलीनता की ये स्थिति आ जाती है. तब उस बात को भूल, इस स्थिति को ईश्वरीय कृपा समझ अनुग्रह से भर जाना ही धार्मिकता है, इसी मे धन्यता है. धन्य हैं आप !
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