एक अदद आदमी
एक अदद औरत
बस मुझे प्रकृति रहने दो
इससे कम मुझे जिस्म नहीं होना
इससे ज्यादा मुझे रूह नहीं बनना
मुझे बनना है फिर वही हव्वा
तुममें देखना है फिर वही आदम
और चखना है फिर वही वर्जित फल
अपने गुनाहों पर शर्मसार होने
मंजूर है मुझे यदि इस गुनाह के बाद
हम प्रकृति हो जाते हैं
सिर्फ एक अदद आदमी
एक अदद औरत.....
हाँ इसे ही तो कहते है न
पिछले जन्मों के धागे पकड़ना
कि मुझे अब भी याद है
उस वर्जित बाग की कहानी
जब तुम हुआ करते थे आदम
और मैं हुआ करती थी हव्वा
बस एक अदद आदमी
एक अदद औरत.... ![]()
हम ही तो है जो बचाएँगे पृथ्वी को
प्रलय के क्षणों में
जब कोई नहीं बचेगा
और हम दो रह जाएँगे
बस एक अदद आदमी
एक अदद औरत
और जीवन की निरंतरता.....
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