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दो लफ्ज़ों का जादू


कल शाम तेरी बातों से जो दो लफ्ज़ चुराकर लाई थी
उसे आँखों पर रखकर मूँद कर देखा
कभी लबों पर रखकर दाँतो तले दबा लिया
लेकिन वो कभी आँखों से आँसू बनकर बह गए
तो कभी हल्की सी मुस्कुराहट से पिघल गए

रात होते होते उन लफ्ज़ों का विस्तार होने लगा
छुपाने की कोई जगह न बची
दुपट्टे के कोने में रखकर गाँठ बाँध ली
और दुपट्टे को रात भर चेहरे पर ओढकर सोई रही
सोचा अब किसी को पता न चलेगा
कि कोई जादू-टोना या टोटके की तरह
दो लफ्ज़ों के मंत्र में फँसी हूँ

लेकिन सुबह सब मुझे आकर बताने लगे
कि रात दो रूहें मेरे दुपट्टे से निकलकर
मेरे माथे की बिंदिया पर जा बैठी थी
जिसे सोने से पहले आइने पर चिपका आई थी

ये कैसा जादू कर दिया
मैं माथे पर क्या सजाऊँ अब?



प्रतिक्रियाएँ

Re: दो लफ्ज़ों का जादू
रूह एक एह्सास है, मह्सूस करें और निःसंकोच माथे को सजाएँ, रूहें बोझ नहीं होतीं, जिन्हे उठाया न जा सके
अस्वीकरण