
कल शाम तेरी बातों से जो दो लफ्ज़ चुराकर लाई थी उसे आँखों पर रखकर मूँद कर देखा कभी लबों पर रखकर दाँतो तले दबा लियालेकिन वो कभी आँखों से आँसू बनकर बह गए तो कभी हल्की सी मुस्कुराहट से पिघल गए रात होते होते उन लफ्ज़ों का विस्तार होने लगा छुपाने की कोई जगह न ...
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