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वो खामोशी की अंधेरी गलियाँ
जहाँ दो–चार शब्दों के दीये
राह दिखाने के लिए
रख दिए गए हैं
वहीं से गुज़र रहा हूँ ....
कई ख़ुफ़िया दरवाज़े
विचारों की मानिंद
राह में मिल जाते हैं
कुछ रोशनी की झालर सजाए
आकर्षित करते हैं
कुछ रहस्यमयी किले के
बड़े से दरवाज़ों की तरह
चुप्प के जालों के साथ
उत्सुकता जगाते हैं।
कुछ किसी बगीचे के
गोल घूमते दरवाज़े की तरह
वहीं छोड जाते हैं
तो कुछ किसी अजायबघर के
मुख्यद्वार पर बनी
ऐतिहासिक रचनाओं की तरह
बड़ी-बड़ी आँखों से तकते रहते हैं।
लेकिन राह अब भी अंधेरी है
कहीं कोई रोशनी की मरीचिका
दिखाई तो दे रही है
शायद उस तक पहुँच सकूँ
शब्दों के दीयों का तेल ख़त्म होने से पहले.....
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