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21 जुलाई, 2008


ब्लॉग्स (2)
साँझ ढले गगन तलेहम कितने एकाकीसाँझ ढले गगन तलेहम कितने एकाकीछोड़ चले नैनो कोकिरणों के पाखीपथ की जाली से झाँक रही थीं कलियाँ गंध भरी गुनगुन में मगन हुई थीं कलियाँइतने में तिमिर दस सपने ले नयनो मेंकलियों के आँसुओं का कोई नहीं साथीछोड चले नयनो कोकिरणों के ... आगे पढ़ें...

मेरी बीस या पच्चीस रचनाओं को पढ़ने के बाद कोई एक रचना उसे पसंद आती है। मेरा सबसे बड़ा और एकमात्र आलोचक है वो.... मैं जिसे पढ़ती हूँ वो उसे कभी पसंद नहीं आता, जो मैं लिखती हूँ उसे पढ़कर वो मुझे ऐसे डाँटता है जैसे कोई टीचर ठीक से होमवर्क न करके लाने के कारण ... आगे पढ़ें...