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अनुभूति को लफ्ज़ों का पैरहन मिल जाता है तो सोलहवे सावन के यौवन की तरह मदमाती है, नहीं मिल पाता तो बावरी हो जाती है....जैसे कोई पागल फटे कपड़ों में दर ब दर भटकती है.............मैंने दोनों अवस्थाओं को भोगा है..........लफ्ज़ों के पैरहन में टँका घमण्ड, चुनरिया पर गुरूर की झालर देखी है.....वहीं दूसरी ओर उस बावरी के मन की भटकन, लफ्ज़ों की तलाश का जुनून...जैसे बाँसुरी की धुन के पीछे दीवानी मीरा, जैसे कस्तुरी मृग का अपनी ही सुगंध के पीछे भागना...भोगा है मैंने.............
इन दोनों अवस्थाओं की अनुभूति के बाद मन कहीं बीच में ठहर गया है..........तय नहीं कर पा रहा उसे लफ्ज़ों का सुंदर पैरहन चाहिए...........या फटे कपड़ों से झाँकता बावरापन..............
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