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जीवन एक मंथन











जीवन एक मंथन सा हो चला है
जहाँ से पहले विष ही निकलता है
अमृत निकलने का विश्वास भी है
प्रतीक्षा है तो उस प्रभु की
जो फिर मोहिनी के रूप में
अंदर के राक्षस को विष पिला दे
और अंदर के देवता को
अमरता का वरदान मिले......
चिंता है तो बस इस बात की
कि क़िस्मत के राहू केतु
कहीं एक बार फिर
भेष बदल कर धोखा न दे जाए.......


प्रतिक्रियाएँ

Re: जीवन एक मंथन
सच जीवन मंथन की तरह ही हो गया है बीच में हम है और समय का सांप बस खींचता जा रहा है कभी मोक्ष की ओर तो कभी क्रोध की ओर। कभी हम एकदम नीचे चलें जाते है, तो कभी रिश्‍तों की डोर डूबने नहीं देती। आपने बहुत पहले लिख दिया था एक सच, जिसे तभी समझ लिया जाता तो, बेहतर होता।
Re: जीवन एक मंथन
सच जीवन मंथन की तरह ही हो गया है बीच में हम है और समय का सांप बस खींचता जा रहा है कभी मोक्ष की ओर तो कभी क्रोध की ओर। कभी हम एकदम नीचे चलें जाते है, तो कभी रिश्‍तों की डोर डूबने नहीं देती। आपने बहुत पहले लिख दिया था एक सच, जिसे तभी समझ लिया जाता तो, बेहतर होता।
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