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जीवन एक मंथन सा हो चला है
जहाँ से पहले विष ही निकलता है
अमृत निकलने का विश्वास भी है
प्रतीक्षा है तो उस प्रभु की
जो फिर मोहिनी के रूप में
अंदर के राक्षस को विष पिला दे
और अंदर के देवता को
अमरता का वरदान मिले......
चिंता है तो बस इस बात की
कि क़िस्मत के राहू केतु
कहीं एक बार फिर
भेष बदल कर धोखा न दे जाए.......
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