
मेरी कुण्ठा रेशम के कीड़ों सी ताने-बाने बुनती, तड़प तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुण्ठा क्वांरी कुन्ती। बाहर आने दूँ तो लोक-लाज मर्यादा भीतर रहने दूँ तो घुटन, सहन से ज्यादा, मेरा यह ...
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