Welcome, Guest   [ Register | Sign In | Take a tour | Adult Filter: On ]

15 जुलाई, 2008


ब्लॉग्स (1)
मेरी कुण्ठा रेशम के कीड़ों सी ताने-बाने बुनती, तड़प तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुण्ठा क्वांरी कुन्ती। बाहर आने दूँ तो लोक-लाज मर्यादा भीतर रहने दूँ तो घुटन, सहन से ज्यादा, मेरा यह ... आगे पढ़ें...