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तुम तुम ही रहो मैं मैं ही रहूँ..............



तुम तुम ही रहो
मैं मैं ही रहूँ..............

जीवन का नितांत सच
उसके परे कुछ असहमतियाँ,
कुछ पसंद
और पसंदीदा शख्स के इर्द गिर्द घूमते पूर्वाग्रह
कुछ लड़ाइयाँ,
और लड़ाइयों के बाद की उत्कंठा

फिर भी तुम तुम ही रहो
मैं मैं ही रहूँ..................

कंधे पर चढ़ते कुछ महत्वकांक्षी पैर,
पैरों को खींचती तंगदिल हरकतें
कुछ शिकायतें, कुछ बहस
और उसके बाद
होठों पर सजी मोम की मुस्कुराहटें
जो ज़रा-सी भी बढ़ी नहीं कि
उसकी दरारों से नफरत रिसने लगती है

फिर भी तुम तुम ही रहो
मैं मैं ही रहूँ..................

मस्जिद पर बैठे परिंदे
और मंदिर के जीने पर फैले हाथ
या इसको उल्टा करके कह दो।

मंदिर में भगवान
मस्जिद में अल्लाह
या इसे उल्टा करके कह दूँ तो??
उसे बुरा नहीं लगेगा
उसे कहीं भी बैठा दो

लेकिन तुम तुम हो
और मैं मैं................

हम कब तक ऐसे ही रहेंगे?

प्रतिक्रियाएँ

Re: तुम तुम ही रहो मैं मैं ही रहूँ..............
बड़े बड़े कारणों पर भी छोटी छोटी सी लड़ाइयाँ लडाइयों के साथ शिकायतें और कुछ नादानियाँ या या इसका उल्‍टा करके कह दे??? रोज़ सूरज की किरणों के साथ, उसकी उदास आंखों में झलकती ताज़गी दिल की धड़कनों में समाई निराशा और चेहरे पर आने वाले वक्‍त की तलाश उसके बाद भी कहना तुम तुम ही रहो मैं मैं ही रहूँ………..???????
Re: तुम तुम ही रहो मैं मैं ही रहूँ..............
एक अच्‍छी और मैच्‍योर कविता... ऐसी कविता, जिसे पढ़कर लगा कि किताबों से अक्षर चुनकर नहीं चिपकाए गए हैं. सब्‍जेक्टिव है, मैं कुछ चीज़ें गेस कर सकता हूं. बाक़ी आप जानें. कविता लिखते ही हम एक्‍सपोज़ हो जाते हैं. यदि यह एक्‍सपोज़र अपने तईं ईमानदार है तो सभी के लिए यह एक संजीदा चीज़ साबित होती है.
अस्वीकरण