तुम तुम ही रहो
मैं मैं ही रहूँ..............
जीवन का नितांत सच
उसके परे कुछ असहमतियाँ,
कुछ पसंद
और पसंदीदा शख्स के इर्द गिर्द घूमते पूर्वाग्रह
कुछ लड़ाइयाँ,
और लड़ाइयों के बाद की उत्कंठा
फिर भी तुम तुम ही रहो
मैं मैं ही रहूँ..................
कंधे पर चढ़ते कुछ महत्वकांक्षी पैर,
पैरों को खींचती तंगदिल हरकतें
कुछ शिकायतें, कुछ बहस
और उसके बाद
होठों पर सजी मोम की मुस्कुराहटें
जो ज़रा-सी भी बढ़ी नहीं कि
उसकी दरारों से नफरत रिसने लगती है
फिर भी तुम तुम ही रहो
मैं मैं ही रहूँ..................
मस्जिद पर बैठे परिंदे
और मंदिर के जीने पर फैले हाथ
या इसको उल्टा करके कह दो।
मंदिर में भगवान
मस्जिद में अल्लाह
या इसे उल्टा करके कह दूँ तो??
उसे बुरा नहीं लगेगा
उसे कहीं भी बैठा दो
लेकिन तुम तुम हो
और मैं मैं................
हम कब तक ऐसे ही रहेंगे?
लोड हो रहा है...
प्रतिक्रियाएँ