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10 जुलाई, 2008


ब्लॉग्स (2)
तुम तुम ही रहोमैं मैं ही रहूँ.............. जीवन का नितांत सचउसके परे कुछ असहमतियाँ, कुछ पसंद और पसंदीदा शख्स के इर्द गिर्द घूमते पूर्वाग्रह कुछ लड़ाइयाँ, और लड़ाइयों के बाद की उत्कंठाफिर भी तुम तुम ही रहो मैं मैं ही रहूँ................... आगे पढ़ें...

...जैसे दुनिया-सी हो चली थी, अहम और नफरत की आग में जलती हुई.....तभी एक हाथ मेरी आँखों के अंधेरे को चीरता हुआ करीब आया और कहने लगा, आ तुझे तेरी रोशनी का शहर दिखाऊँ जहाँ पिछले जनम में तू घर-घर जाकर उम्मीद के दीये जलाकर आई थी। वहाँ हर घर में शब्दों ने जन्म ... आगे पढ़ें...